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RDG End ? : आरडीजी खत्म करना हिमाचल के अधिकारों पर चोट

RDG End ? : आरडीजी खत्म करना हिमाचल के अधिकारों पर चोट

RDG End ? : 
आरडीजी खत्म करना हिमाचल के अधिकारों पर चोट

आरडीजी खत्म करना जनता के अधिकारों पर चोट,
हिमाचल चुप नहीं बैठेगा : मुख्यमंत्री सुक्खू

Himachal today tv.

शिमला.हिमाचल टूडे टीवी।   मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को समाप्त किए जाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार और विपक्ष पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आरडीजी की समाप्ति किसी सरकार का नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की जनता के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि आरडीजी एक बार समाप्त कर दी गई, तो राज्य के अधिकारों की रक्षा करना कठिन हो जाएगा। उन्होंने भाजपा सांसदों और विधायकों से एकजुट होकर दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मिलने की अपील करते हुए कहा कि राज्य हित में सरकार हर कदम उठाने को तैयार है।

मुख्यमंत्री ने अफसोस जताया कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर आयोजित प्रस्तुति में भाजपा विधायकों को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन वे इसमें शामिल नहीं हुए। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा विधायक प्रस्तुति में भाग लेते, तो उन्हें राज्य की वास्तविक आर्थिक स्थिति को बेहतर तरीके से समझने का अवसर मिलता।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने बताया कि देश के 17 राज्यों के लिए आरडीजी समाप्त कर दी गई है, लेकिन इसका सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव हिमाचल प्रदेश पर पड़ा है। राज्य के कुल बजट का 12.7 प्रतिशत हिस्सा आरडीजी से आता है, जो देश में दूसरा सबसे बड़ा अनुपात है।

उन्होंने कहा कि 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट का राज्य की अर्थव्यवस्था और आगामी बजट पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद राज्य में कर संग्रह की दर 13–14 प्रतिशत से घटकर लगभग 8 प्रतिशत रह गई है। हिमाचल जैसे उत्पादक राज्य के लिए उपभोग आधारित जीएसटी व्यवस्था नुकसानदेह साबित हुई है। उन्होंने बताया कि 75 लाख की आबादी वाले प्रदेश से कर लगाने की शक्ति भी छिन गई है, जिससे राज्य की आर्थिक चुनौतियां और गहरी हो गई हैं।

बिजली परियोजनाओं में हिमाचल का हक़ तय हो: सीएम सुक्खू की केंद्र से दो टूक मांग

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने प्रदेश के हितों की पुरजोर पैरवी करते हुए केंद्र सरकार से बिजली परियोजनाओं में हिमाचल का हक सुनिश्चित करने की जोरदार मांग की है। उन्होंने कहा कि जिन जलविद्युत परियोजनाओं ने अपना कर्ज चुका दिया है, उनसे केंद्र सरकार को कम से कम 50 प्रतिशत रॉयल्टी राज्य को देनी चाहिए। इसके साथ ही जिन परियोजनाओं का संचालन 40 वर्ष पूरा हो चुका है, उन्हें बिना देरी राज्य को लौटाया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने खुलासा किया कि वर्ष 2012 से अब तक भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) के करीब 4500 करोड़ रुपये की बकाया राशि हिमाचल को नहीं मिली है, जबकि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी आ चुका है। उन्होंने इसे प्रदेश के अधिकारों का खुला उल्लंघन बताया।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि शानन पावर प्रोजेक्ट की लीज अवधि समाप्त हो चुकी है और इसे पंजाब सरकार से वापस लेने के लिए राज्य सरकार कानूनी लड़ाई लड़ रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिमाचल अपने संसाधनों और अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा।

हिमाचल को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार प्रतिबद्ध: मुख्यमंत्री सुक्खू

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है कि राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है और इस दिशा में पहले दिन से ही निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार संसाधन जुटाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से अब तक 26,683 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है, लेकिन यह राज्य की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश के पास राजस्व के मुख्य स्रोत नदियां, वन सम्पदा और पर्यटन ही हैं, ऐसे में संसाधनों का विस्तार एक बड़ी चुनौती है।

कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर पूरी मजबूती से लागू

मुख्यमंत्री सुक्खू ने प्रदेशवासियों को आश्वासन देते हुए कहा कि लोगों के हित में चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर पूरी मजबूती से लागू किया जाएगा। साथ ही राज्य के संसाधनों में वृद्धि करने और प्रदेश के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार का संघर्ष लगातार जारी रहेगा।

अतिरिक्त बोझ डाले बिना लिए संसाधन सृजन की दिशा में नीतिगत निर्णय

मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि राज्य सरकार ने आम आदमी पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना संसाधन सृजन की दिशा में नीतिगत निर्णय लिए हैं। 16वें वित्त आयोग के समक्ष वन क्षेत्र से जुड़े मुद्दे को मजबूती से उठाया गया, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया है। इसके अलावा भूस्खलन से होने वाली आपदाओं के लिए भी धन आवंटन पर सहमति बनी है, जबकि इससे पहले केवल सूखा और चक्रवात को ही आपदा की श्रेणी में शामिल किया जाता था।

आरडीजी बंद होने से हिमाचल पर संसाधनों का संकट गहराया, पहाड़ी राज्य के हक़ की फिर उठी मांग

राजस्व घाटा अनुदान(आरडीजी) को हिमाचल प्रदेश की आर्थिक रीढ़ माना जाता रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत 15वें वित्त आयोग तक राज्य को मिलता रहा। लेकिन अब इसके समाप्त होने से पहाड़ी राज्य के सामने गंभीर वित्तीय संकट खड़ा हो गया है। वित्तीय आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2021-26 के दौरान राज्य की आय 90,760 करोड़ रुपये और व्यय 1,70,930 करोड़ रुपये आंका गया था। करीब 80,170 करोड़ रुपये के घाटे को टैक्स डिवॉल्यूशन, आरडीजी और अन्य अनुदानों के जरिए पूरा किया गया था।

वर्तमान में राज्य की आय लगभग 18,000 करोड़ रुपये है, जबकि वेतन, पेंशन, ऋण भुगतान, सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं सहित प्रतिबद्ध व्यय करीब 48,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। केंद्रीय करों में हिस्सेदारी और ऋण सीमा जोड़ने के बाद भी कुल संसाधन लगभग 42,000 करोड़ रुपये ही उपलब्ध हो पा रहे हैं, जिससे बजट संतुलन मुश्किल हो गया है।

वित्त विभाग के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में विकास कार्यों और योजनाओं को छोड़कर भी करीब 6,000 करोड़ रुपये का संसाधन अंतर बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्व बढ़ाने और व्यय घटाने के उपाय तुरंत लागू नहीं हो सकते, ऐसे में आरडीजी जैसी सहायता ही पहाड़ी राज्यों के लिए जीवनरेखा साबित होती रही है।

विशेषज्ञों ने चेताया है कि हिमाचल जैसे भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण राज्यों को विशेष श्रेणी का दर्जा इसलिए मिला था क्योंकि उनकी आर्थिक संरचना सीमित है। आरडीजी समाप्त होने का असर न केवल वर्तमान बल्कि आने वाली सरकारों और प्रदेश की जनता पर भी दूरगामी पड़ेगा।

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