Himachal Industrial Trade Expo-2025: हिमाचल की ‘हस्तशिल्प’ नीति या युवाओं के भविष्य के साथ मज़ाक?

Himachal Industrial Trade Expo-2025: हिमाचल की ‘हस्तशिल्प’ नीति या युवाओं के भविष्य के साथ मज़ाक?
Himachal Industrial Trade Expo-2025: हस्तशिल्प और हथकरघा पर टिकी हिमाचल की उम्मीदें, लेकिन युवाओं के भविष्य पर तकनीकी मज़ाक क्यों?

Can Himachal's Handicrafts Power Economic Growth? Unanswered Technical Gaps Raise Alarms

हिमाचल औद्योगिक व्यापार एक्सपो-2025  

प्रश्न : उत्तर बाकी है-
+ बड़े उद्योगों के लिए कोई जमीन या निवेश नीति क्यों नहीं?
+ स्थानीय युवा कौन सा कौशल सीख रहे हैं? क्या यह बाज़ार योग्य है?
+ क्या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर सर्टिफाइड प्रोडक्शन यूनिट्स हिमाचल में हैं?
+ क्या इन नीतियों से पलायन रुकेगा या बढ़ेगा?
+ यदि 10,000 करोड़ का व्यापार हुआ, तो गांव में कारीगरों की आमदनी कितनी बढ़ी?

HimachalToday.in

मंडी से रिपोर्ट | 23 जून 2025 | 

हिमाचल प्रदेश के उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने मंडी में आयोजित हिमाचल औद्योगिक व्यापार एक्सपो-2025 में जहां एक ओर हस्तशिल्प और हथकरघा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की बात कही, वहीं दूसरी ओर इस आयोजन ने कई ऐसे सवालों को जन्म दे दिया, जिनके उत्तर न मंत्री के पास हैं और न ही विभाग के पास कोई ठोस योजना।

हथकरघा समूहों को क्लस्टर मॉडल में लाने की योजना

चौहान ने कहा कि राज्य सरकार छोटे-छोटे समूहों में कार्य कर रहे हथकरघा और शिल्प समूहों को एक बड़े क्लस्टर मॉडल में परिवर्तित करेगी, जिससे उनका उत्पादन और विपणन बड़े स्तर पर संभव हो सके और परिवहन लागत सहित अन्य खर्चों में कमी लाई जा सके। उन्होंने कहा कि हिमाचल के खानपान और परिधान की विविधता को देशभर में फैलाना और इसे एक व्यावसायिक ब्रांड के रूप में स्थापित करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

Himachal Industrial Trade Expo-2025: हिमाचल की ‘हस्तशिल्प’ नीति या युवाओं के भविष्य के साथ मज़ाक?

हस्तशिल्प और हैंडलूम के लिए आधुनिक प्रशिक्षण

उद्योग मंत्री ने कहा कि  हिमाचल की समृद्ध पारंपरिक शिल्प को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए स्थानीय कारीगरों को आधुनिक डिजाइनों, गुणवत्ता और वैश्विक मानकों के अनुसार प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी प्रतिस्पर्धा कर सकें। उन्होंने कहा कि देश के अधिकांश क्षेत्र गर्म जलवायु वाले हैं, जिसके चलते हिमाचल के ऊनी वस्त्रों का भारत में सीमित बाजार है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्हें अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता जरूरतों के अनुरूप ढालने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। 

अधिकारी एवं गणमान्य नागरिक रहे उपस्थित 

विधायक  चन्द्रशेखर, पूर्व मुख्य संसदीय सचिव सोहन लाल ठाकुर, एपीएमसी मंडी के अध्यक्ष संजीव गुलेरिया, प्रदेश कांग्रेस महासचिव  चम्पा ठाकुर, सहायक निदेशक एमएसएमई डीएफओ सोलन अशोक कुमार गौतम, पीएचडीसीसीआई के सह-अध्यक्ष विशाल चौहान, निदेशक अनिल कुमार सांखला, एडीसी मंडी गुरसिमर सिंह, एएसपी सचिन हीरेमठ, एसडीएम मंडी रूपिंदर कौर, वाइस प्रेसिडेंट गुरुद्वारा साहिब कमेटी गुरचरण सिंह सहित अनेक अधिकारी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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युवाओं को आधुनिक प्रशिक्षण या ‘कोरा दिखावा’  ?

सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की गुणवत्ता पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। "आधुनिक डिज़ाइन और वैश्विक मानकों" की बात जरूर हो रही है, लेकिन सवाल ये है कि क्या इन प्रशिक्षणों में शामिल तकनीक और बाजार की मांगों में कोई तालमेल है? क्या स्थानीय युवाओं को मार्केटिंग, ब्रांडिंग, ऑनलाइन सेल्स, या इंटरनेशनल ट्रेड लॉ की शिक्षा दी जा रही है या सिर्फ पुराने ढर्रे पर कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं? 

हथकरघा और हस्तशिल्प से हिमाचल का औद्योगिक भविष्य ?

 राज्य सरकार गांवों में पारंपरिक उत्पादों को बढ़ावा देने की बात कर रही है, लेकिन बड़े उद्योगों को स्थापित करने की कोई ठोस नीति या योजना आज भी जमीन पर नहीं है। छोटे कारीगरों को मंच देना सराहनीय है, लेकिन क्या इससे प्रदेश के हजारों बेरोज़गार युवाओं का भविष्य बनेगा? 

उद्योग मंत्री जी का दावा, लेकिन नीति अधूरी

उद्योग मंत्री ने अपने भाषण में हिमाचली वस्त्रों की राष्ट्रीय सराहना और दिल्ली में हुए करोड़ों के व्यापार का हवाला दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसका वास्तविक लाभ गांवों में रहने वाले कारीगरों को मिला या बिचौलियों को? प्रश्न जिनका उत्तर बाकी है: 

प्रश्न जिनका उत्तर बाकी है:

  1. बड़े उद्योगों के लिए कोई जमीन या निवेश नीति क्यों नहीं?

  2. स्थानीय युवा कौन सा कौशल सीख रहे हैं? क्या यह बाज़ार योग्य है?

  3. क्या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर सर्टिफाइड प्रोडक्शन यूनिट्स हिमाचल में हैं?

  4. क्या इन नीतियों से पलायन रुकेगा या बढ़ेगा?

  5. यदि 10,000 करोड़ का व्यापार हुआ, तो गांव में कारीगरों की आमदनी कितनी बढ़ी?

बड़े उद्योगों की स्थापना, कौशल आधारित रोजगार और पारदर्शिता

 राज्य सरकार गांवों में पारंपरिक उत्पादों को बढ़ावा देने की बात कर रही है, लेकिन बड़े उद्योगों को स्थापित करने की कोई ठोस नीति या योजना आज भी जमीन पर नहीं है। छोटे कारीगरों को मंच देना सराहनीय है, लेकिन क्या इससे प्रदेश के हजारों बेरोज़गार युवाओं का भविष्य बनेगा? उद्योग मंत्री जी का दावा, लेकिन नीति अधूरी उद्योग मंत्री ने अपने भाषण में हिमाचली वस्त्रों की राष्ट्रीय सराहना और दिल्ली में हुए करोड़ों के व्यापार का हवाला दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसका वास्तविक लाभ गांवों में रहने वाले कारीगरों को मिला या बिचौलियों को? प्रश्न जिनका उत्तर बाकी है: 

बड़े उद्योगों के लिए कोई जमीन या निवेश नीति क्यों नहीं? 

स्थानीय युवा कौन सा कौशल सीख रहे हैं? क्या यह बाज़ार योग्य है? क्या अंतरराष्ट्रीय मानकों पर सर्टिफाइड प्रोडक्शन यूनिट्स हिमाचल में हैं? क्या इन नीतियों से पलायन रुकेगा या बढ़ेगा? यदि 10,000 करोड़ का व्यापार हुआ, तो गांव में कारीगरों की आमदनी कितनी बढ़ी?

एक ओर सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हिमाचली उत्पादों को ब्रांड बनाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी सच्चाई यह है कि प्रशिक्षण, योजना और नीति में गंभीर खामियां हैं।

जब तक हिमाचल में बड़े उद्योगों की स्थापना, कौशल आधारित रोजगार और पारदर्शिता नहीं आती, तब तक ये योजनाएं सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेंगी। ---Ansari.
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