हिमाचल की ट्रेनी पॉलिसी पर भड़की NSUI, छात्रों की आस्था टूटी, सरकार से किया बदलाव का अनुरोध
+ छात्रों की आस्था टूटी, सरकार से किया बदलाव का अनुरोध
+ कुछ पदों को क्यों मिली छूट? उठे सवाल
+ क्या सुक्खू सरकार लेगी युवाओं की बात का संज्ञान?
HimachalToday Tv
सुंदरनगर (मंडी), 25 जुलाई — हिमाचल प्रदेश में लागू की गई नई ट्रेनी पॉलिसी को लेकर युवाओं में जबरदस्त रोष है। अब यह गुस्सा राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है, क्योंकि राष्ट्रीय छात्र संघ (NSUI) सुंदरनगर ने इस नीति के खिलाफ खुलकर विरोध दर्ज कराते हुए सरकार को सड़कों पर उतरने की चेतावनी दे दी है।
पूर्व NSUI अध्यक्ष मोहित ठाकुर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने एसडीएम सुंदरनगर के माध्यम से मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को ज्ञापन सौंपा और नई ट्रेनी पॉलिसी को छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बताया।
क्या है विवादित ट्रेनी पॉलिसी?
हाल ही में हिमाचल सरकार ने सरकारी विभागों, बोर्डों व निगमों में ग्रुप-A, B और C पदों पर सीधी भर्ती से चयनित अभ्यर्थियों को 'जॉब ट्रेनी' के रूप में नियुक्त करने की अधिसूचना जारी की है। दो साल तक चयनित अभ्यर्थियों को नियमित कर्मचारी नहीं माना जाएगा।
इस दौरान उन्हें पेंशन, अवकाश, भत्ता, वेतनमान जैसी किसी भी सुविधा का लाभ नहीं मिलेगा। केवल एक निर्धारित मासिक मानदेय और सीमित छुट्टियों की अनुमति होगी। दो साल की अवधि के बाद दक्षता परीक्षा पास करने पर ही स्थायी नियुक्ति दी जाएगी।
NSUI ने इसे बताया युवा विरोधी और शोषण की नीति
पूर्व अध्यक्ष मोहित ठाकुर ने कहा कि NSUI का गठन छात्रों की आवाज़ को बुलंद करने के लिए हुआ है, और जब सरकार खुद युवाओं के भविष्य को दांव पर लगाने लगे, तो चुप बैठना संगठन के सिद्धांतों के खिलाफ है।
मोहित ठाकुर ने बताया कि जैसे ही ट्रेनी पॉलिसी की सूचना छात्रों और सरकारी नौकरी के अभ्यर्थियों तक पहुँची, उनमें जबरदस्त आक्रोश फैला। अभ्यर्थियों ने NSUI से संपर्क कर अपनी नाराजगी जाहिर की, जिसके बाद संगठन ने सरकार तक छात्रों की बात पहुँचाने का निर्णय लिया।
क्या है NSUI की आपत्ति?
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दो साल तक नौकरी के नाम पर केवल ट्रेनी बना कर रखना युवाओं का शोषण है।
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इस दौरान कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी – न पेंशन, न भत्ता, न स्थायित्व।
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यह नीति बेरोजगार युवाओं को और अधिक अनिश्चितता के गर्त में धकेलेगी।
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नियमित परीक्षा पास करने के बाद भी जॉब की गारंटी नहीं, जिससे मानसिक तनाव और असुरक्षा बढ़ेगी।
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चयनित होने के बावजूद वे "सरकारी कर्मचारी" नहीं माने जाएंगे — यह विरोधाभास है।
छात्रों की आस्था टूटी, सरकार से किया बदलाव का अनुरोध
NSUI ने सरकार से मांग की है कि वह इस नीति पर पुनः विचार करे और इसे युवाओं के लिए अनुकूल और न्यायसंगत बनाए। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं करेगी और जल्दी ही इस नीति में बदलाव करेगी।
कुछ पदों को क्यों मिली छूट? उठे सवाल
ज्ञात हो कि अधिसूचना के अनुसार, कुछ पदों जैसे HAS, Naib Tehsildar, Civil Judge, Medical College Professors, Police Constables आदि को इस नीति से बाहर रखा गया है। NSUI ने सवाल उठाए कि जब नीति पारदर्शिता के लिए लाई जा रही है, तो अपवाद क्यों बनाए गए?
क्या यह दिखाता है कि नीति का उद्देश्य समानता नहीं, बल्कि भेदभाव है?
NSUI ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर सरकार जल्द से जल्द इस ट्रेनी पॉलिसी को रद्द या संशोधित नहीं करती, तो प्रदेशभर में जोरदार आंदोलन छेड़ा जाएगा। संगठन ने युवाओं से एकजुट होकर इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने की अपील की है।
क्या सुक्खू सरकार लेगी युवाओं की बात का संज्ञान?
सवाल अब यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू युवाओं की इस मांग को गंभीरता से लेंगे या यह पॉलिसी सरकार और छात्रों के बीच एक नया संघर्ष खड़ा करेगी?
क्या हिमाचल जैसे शिक्षित राज्य में बेरोजगारी को राहत देने की बजाय और अधिक भ्रम और असुरक्षा की स्थिति पैदा की जा रही है?
जहाँ एक ओर सरकार पारदर्शिता और दक्षता की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर छात्र संगठन NSUI और हजारों युवा इस पॉलिसी को "भर्ती के नाम पर शोषण" करार दे रहे हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार इस जनभावना को समझकर नीति में बदलाव करती है या टकराव का रास्ता चुनती है।
... रिपोर्ट | हिमाचल टुडे टीवी.
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